A scene from the movie

फिल्म साउंड ऑफ फ्रीडम धूम मचा रही है। मैंने फिल्म के निर्माण के बारे में कुछ वृत्तचित्र देखे। एक मुहावरा जिसने मेरा ध्यान खींचा वह था “पे इट फॉरवर्ड – इसे आगे बढ़ाओ”। वे इस मुहावरे का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए  कर रहे थे कि हर किसी को यह फिल्म देखने का मौका मिले; जो लोग इसे देखने के लिए भुगतान कर सकते थे वे फिल्म देखें और उसे आगे बढ़ाए, जिससे जो लोग इसे देखने के लिए भुगतान नहीं कर सकते थे उन्हें भी इसे देखने का मौका मिले। उद्देश्य यह है कि हर कोई मानव-तस्करी की अंधेरी और खतरनाक दुनिया को गहराई से देख सके और इस जघन्य अपराध को समझ सके।

कुछ साल पहले जब मैंने उत्तरजीवियों के लिए फ्रीडम फर्म के आभूषण प्रशिक्षण कार्यक्रम का निरीक्षण किया था, तो मुझे याद है कि कार्यशाला में मेरी मुलाक़ात  एक उत्तरजीवी लड़की से हुई थी। वह कुछ साहसी लोगों में से एक थी। वह जब कार्यशाला में आती थी तो अपने कदमों में जोश और आंखों में चमक लिए आया करती थी। वह एक लड़के से प्यार करती थी और उसके प्रभाव में आ गई थी, जो उसे मिलनी चाहिए थी वह ” आज़ादी” न मिलने के कारण लड़की निराश थी। भले ही वह कुछ महीने पहले 18 साल की हो गई हो, लेकिन वह नादान थी और अपने जीवन के लिए उचित निर्णय लेने की परिपक्वता उस में नहीं थी। हम उसके प्रेमी से मिलना चाहते थे लेकिन वह हमसे मिलना नहीं चाहता था (आश्चर्य आश्चर्य!)। एक दिन गुस्से में उसने कह दिया कि वह “वहाँ” अधिक खुश थी, वहाँ का अर्थ था रेड लाइट एरिया में, वही जगह जहाँ से उसे और उसकी वर्कशॉप की साथियों को बचाया गया था। यह सुनकर मुझे एक झटका-सा लगा। जब मैं कुछ ठीक हुआ तो मैंने उसकी ओर देखा और कहा, “आज आप जहाँ हैं वहाँ आप को लाने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी है । आप सुरक्षित हैं यह सुनिश्चित करने के लिए कई अच्छे लोगों ने अपनी जान जोखिम में डाल दी थी, आप सुरक्षित हैं यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे पैसे खर्च किए गए है।” इसलिए मैंने उसे संस्थापक से, जो उन अच्छे लोगों में से एक थे, उन्हें मिलकर उन से वह “वहाँ” अधिक खुश थी यह बात बताने के लिए कहा। मैंने तब जा के राहत की सांस ली जब मेरी बात सुनकर उसने मुझे घूरकर देखा और फिर वापस अपनी मेज पर चली गई। 

आज़ादी पाने के लिए एक कीमत चुकानी पड़ती है। इसमें पैसे खर्च होते है, इसमें समय खर्च होता है, विचार-मंथन के लिए कई दिमागों को एक साथ आना पड़ता है; लेकिन सबसे बढ़कर, इस में कईयों को अपने जीवन का बलिदान देना पड़ता है। इस महीने हम भारतीय आजादी के 76 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। मैंने अपने दादा-दादी, बड़े-बुज़ुर्गों, गुरुओं और अन्य लोगों से स्वतंत्रता संग्राम की और आपातकाल के दौरान असहमति की आवाज़ों के बारे में कई कहानियाँ सुनी हैं। हमने उन लोगों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है जिन्होंने इन संघर्षों का नेतृत्व किया था। मैंने अपने समय में उनमें से एक बनने  का सपना देखा है (मुस्कान)। विभिन्न स्वतंत्रता संग्रामों के इन नेताओं में से कई नेताओं ने स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना जीवन, अपना स्वास्थ्य, अपना धन और बहुत कुछ खो दिया है। उनमें से अधिकांश  उस स्वतंत्रता का आनंद नहीं उठा सके जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे थे।

पहले किसी और के द्वारा चुकाई गई उस कीमत के कारण ही आज आप और मैं स्वतंत्र जीवन का आनंद उठा सकते हैं। आज हमारे पास मौलिक अधिकार हैं और हम इन अधिकारों का उपयोग कर सकते हैं। मैं लिख सकता हूँ और आप पढ़ सकते हैं यही इस बात का प्रमाण है। हम आज़ाद हैं। आज हम सब के पास वोट देने की आज़ादी है, संपत्ति रखने की आज़ादी है, सीखने की आज़ादी है, घूमने की आज़ादी है, बोलने की आज़ादी है और अभिव्यक्ति की आज़ादी है…

जब मैं स्वतंत्रता का आनंद उठाता हूँ तब मैं अपने आस-पास के उन लोगों को देखने के लिए मजबूर हो जाता हूँ जो इस प्रकार की स्वतंत्रता का आनंद नहीं उठा पाते हैं। मैं आपको भी अपनी चारों ओर देखने का आह्वान करता हूं। कौन है ये लोग? वे घर पर हमारे सहायक हो सकते हैं या हमारे कर्मचारी/सहकर्मी हो सकते हैं; कुछ लोग जो अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं वे या फिर कुछ लोग जो अपने घरों में दैनिक दुर्व्यवहार सह रहे हैं वे हो सकते हैं, और फिर ऐसे लोग भी हैं जो इस कथित प्रगतिशील समय में रहने के बावजूद अभी भी एक निश्चित जाति, धर्म या रंग में पैदा होने के कारण भेदभाव का सामना कर रहे हैं। निश्चित रूप से यह सड़क पर रहने वाला एक बच्चा है जो अपने परिवार को नहीं जानता या फिर रेड लाइट एरिया में वेश्यावृत्ति के माध्यम से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाली उन सैकड़ों महिलाएं हैं और छोटे से गांव की उन युवा लड़कियाँ है जो बड़े उत्साह से बड़े शहर में एक स्पा में काम करने के लिए आई थी और शहर में आने के बाद उन्हें केवल यह एहसास हुआ कि उन्हें ब्यूटीशियन बनने का कौशल सीखने के बजाय लंपट लोलुप व्यभिचारी ग्राहकों को एक्स रेटेड सेवाएँ कैसे प्रदान किया जाए यह सीखना पड़ रहा था।

Catherine Raja राष्ट्रीय निदेशक,